.
Skip to content

ए मन मेरा हुआ चंचल

संजय सिंह

संजय सिंह "सलिल"

गज़ल/गीतिका

February 3, 2017

ए मन मेरा हुआ चंचल न जाने क्यों बहकता है l
मेरे घर के रहा जो सामने छत पर टहलता है ll

समा है चांदनी रातों का उसपर मेघ काले हैं l
हवाएं चल रही हैं जोर पल्लू भी सकता है ll

नहीं उसको पता कुछ भी मेरी अपनी जो हालत है l
मेरा मन मोर है व्याकुल यह मौसम भी समझता है ll

हवा का साथ ना देना लटों का पीछे ही रहना l
कदम तो आगे बढ़ते हैं लगे मन पीछे रहता है ll

रहा जो दिल में ही अपने उसे अब ढूंढना कैसा l
करूं मैं बंद जब आंखें वो मेरे दिल में रहता है ll

नहीं भूला अभी तक तिरछी नजरों देखना उसका l
हुई मुद्दत गए उसको “सलिल”अब तक महकता है ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश l

Author
संजय सिंह
मैं ,स्थान प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश मे, सिविल इंजीनियर हूं, लिखना मेरा शौक है l गजल,दोहा,सोरठा, कुंडलिया, कविता, मुक्तक इत्यादि विधा मे रचनाएं लिख रहा हूं l सितंबर 2016 से सोशल मीडिया पर हूं I मंच पर काव्य पाठ तथा मंच... Read more
Recommended Posts
II दीप उम्मीद का II
मुश्किलें भी मिली चैन जाता रहा l ठोकरों से सदा जख्म पाता रहा ll चांद आता रहा और जाता रहा l दीप उम्मीद का जगमगाता... Read more
II  एक चितवन से.....II
एक चितवन से ए मन चपल हो गया l बात कुछ तो रही जो विकल हो गया l जाने क्या कह गई अधखुली सी पलक... Read more
II  नसीबा हि दुश्मन.....II
नसीबा हि दुश्मन हमारा हुआ है l जहां डूबी कश्ती किनारा हुआ है ll मेरी मुफलिसी छोड़ जाती नहीं हैl मेरा घर हि उसका ठिकाना... Read more
II..पाठ पढ़ ले प्रेम का...II
बात चलती जब कभी भी बंदगी की l घेरने लगती है यादें फिर किसी की ll मेरा रब वो मेरा ईश्वर है वही सब l... Read more