गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ए ज़िंदगी मुझको तेरी रस्म- ओ- राह देखनी है

ए ज़िंदगी मुझको तेरी रस्म- ओ- राह देखनी है
उठाए दिल में क़सक जब उठे वो निगाह देखनी है

वक़्त जहाँ जा के ठहरता है मुझे वो शै दिखा दो
तैयार हूँ तस्वीर सफ़ेद -ओ- सियाह देखनी है

समंदर के तूफ़ानों से घबरा के दौड़कर आती
लहरों की ख़ातिर वो साहिल की पनाह देखनी है

सुकूने दिल लूटकर किसी का वो दर्द-ए-जिगर जहाँ
चैन से सोता है वो आराम – गाह देखनी है

इंसान की इंसानियत पर जां-निसारी देखकर
खुदा झुकता हो जहाँ वो इबादत-गाह देखनी है

वार ख़ाली नहीं जाता कभी सच्ची मोहब्बत का
दिल की गहराई तक पुर-असर वो आह देखनी है

खुद अपने ही ज़ख़्मों पर ग़ज़ल लिखनेवालों की ‘सरु’
कैसे होती है महफ़िल में वाह – वाह देखनी है

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