मुक्तक · Reading time: 1 minute

एहसान भी गुनाह है

*खुदगर्ज की बस्ती में,*

*एहसान भी एक गुनाह हैं,*

*जिसे तैरना सिखाओ,*

*वही डुबाने को तैयार रहता हैं . . .*

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