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एक ग़ज़ल “बह्र-ए-जमील” पर

Rohitashwa Mishra

Rohitashwa Mishra

गज़ल/गीतिका

April 18, 2017

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को’ बुला रहा था।

वो’ कह रहा था बुझाए’गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो’ ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने’ क्यों मुस्करा रहा था।

वो सबक़-ए-उल्फत हम ही से पढ़कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है’ टाइम तो’ चुप है’ “रोहित”।
नहीं तो’ ये आईना रहा था।

©रोहिताश्व मिश्रा

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Author
Rohitashwa Mishra
"रोहित" फ़र्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)
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