कहानी · Reading time: 3 minutes

एक ‘स्मृति’ऐसी भी ।

एक ‘स्मृति’ ऐसी भी !

शाम को लगभग आठ बजे रहे थे। मैं अपने मित्र के दुकान के बाहर हमेशा की तरह उस दिन भी खड़ा था। कोरोना काल के कारण प्रशासन का यह शख़्त आदेश था कि सायं सात बजे दुकानें बंद हो जानी चाहिए। आदेशानुसार दुकाने बंद हो चुकी थी। मैं बाहर ही खड़ा था। चारों ओर बिल्कुल सन्नाटा ही सन्नाटा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कर्फ्यू लगा दिया गया हो। सभी दुकानदार अपने अपने घर जा चुके थे। एक दो मनचले ही इधर उधर घुम रहे थे। अचानक मुझे कुछ रेंगता हुआ दिखाई पड़ा। न जाने कहाँ से एक विषैला कला चितकबरा साँप, लगभग दो से ढाई फ़ीट लंबा, मेरी तरफ तेजी से बढ़ रहा था। उसकी गति इतनी तेज थी कि मैं अपने आपको सम्भाल नहीं पाया और जोरों से अपने जूते को पटका। लेकिन उसने अपनी गति कम नहीं की बल्कि दुसरी ओर मुड़ने लगा।
मैं ख़यालों की दुनिया में अपने विद्यालय जीवन की ओर चला गया। तब मैं नौवीं कक्षा में ‘स्मृति’ श्री राम शर्मा ‘गुलेरी’ द्वारा लिखित एक कहानी पढ़ा था। मेरी यादें ताज़ा हो गई कि सांप को कान नहीं होता। अतः वह आँख से सुनता है। इस कारण उसे चक्षुश्रवा भी कहते हैं। कहानी की बहुत सारी बातें मेरे दिमाग में कौंधने लगी। अचानक बिजली चली गई। चारों ओर अंधेरा और सन्नाटा छा गया था। मैं बिल्कुल असमंजस में था कि मैं करूँ तो क्या करूं। मैंने अपने मित्र को डंडा अर्थात नारायण वाहन लाने के लिए कहा। शीघ्र ही उसने लाया। मेरा मित्र पसीना से लथपथ था। वह सोचने लगा अब क्या करूँ क्योंकि ऐसी घटना तीन बार घट चुकी थी। एक बार उसने इसी डंडे से एक साँप को मार भी दिया था। अतः यह डंडा तो नारायण वाहन हो चुका था।
इक्का-दुक्का लोगों की आवाज सुनकर लोग तमाशा देखने पहुँच गए। साँप फ़न उठा कर दायें बायें इधर उधर प्रहार कर रहा था। कुछ देर बाद वो थक सा गया और अंधेरा का लाभ उठाकर मेरे मित्र के मोटरसाइकिल में घुस गया। ये तो और भी असमंजस वाली बात थी कि अब इसे बाहर कैसे निकाला जाये। सभी अपनी अपनी तरकीब आजमा रहे थें। कोई बाल्टी से पानी डाल रहा था तो कोई………वग़ैरह वग़ैरह !!
भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। बिजली गुल होने के कारण सभी ने अपने अपने मोबाइल का टार्च जलाया। मोबाइल का टार्च देखकर मुझे प्रधानमंत्री जी की बातें याद आ गई जब उन्होंने कहा था कि रात नौ बजे नौ मिनट तक मोमबत्ती या मोबाइल टार्च जलाना है। वो मंज़र मुझे दुबारा दिखने को मिला। मेरा मित्र निःसहाय होकर पसीना से लथपथ एक ओर डरा डरा सा खड़ा हो गया।

मोबाइल का टार्च देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे रात में ढेर सारे जुगनू शिकार करने के लिए निकले हो। बेचारा साँप को भी आभास हो गया कि यहाँ से जीवित निकलना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन भी है। कुछ समय बाद साँप मोटरसाइकिल के इंडिकेटर लाइट के पीछे से अपना सिर बाहर निकाला। उसके इस अंग को देखकर लोगों में भगदड़ मच गई। जैसे ही भीड़ पीछे हटी ढाई फ़ीट लम्बे साँप ने तेजी से भागना शुरू किया। भीड़ चिल्ला उठी। अफ़सोस! किसी ने मेरे मित्र के हाथ से एक झटके में नारायण वाहन को छिनकर साँप के सिर पर ज़ोरदार प्रहार कर दिया। डंडा पड़ते ही उस निरीह प्राणी के प्राण पखेरु उड़ गए।

… दीपक कुमार शर्मा,
उखड़ा, पश्चिम बंगाल

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