एक सुबह

एक सुबह देखी मैंने खंजन
तरुवर साख पे वो बैठी थी
नैन बसी कोई अभिलाषा
वो हृदय आस लिए बैठी थी
आते जाते हर पंक्षी को वो
विरल भांति से तकती थी
जैसे कोई लाया हो सन्देशा
फिर निरा उदास वो होती थी
साहस कर एक दिन उड़ बैठी
गगन ऊंचाई जब उसने नापी
प्रसन्न मुख हिलोर हृदय थी
मन मधुवन सावन हरषाया
पाया भान आनन्द गगन का
सुखद अनुभव वो ईश मिलन का
उठ मनुज क्यों तू अलसाया
कर पुरुषार्थ क्यों तू भरमाया
लक्ष्य तेरा है तुझे पुकारे
खंजन भांति तू किसे निहारे
सोच जरा क्यों जन्म मिला है
मानव श्रेष्ठ का देह मिला है
उद्देश्य क्या तेरे जीवन का
किसने प्राण वरदान दिया है
एक मात्र सत्य वही सृष्टि का
अंश उसी का तुझमे खिला है
सत्य प्रेम का विस्तार करो
सर्वोच्च शक्ति का वरदान बनो
सर्वोत्कृष्ट कृति तुम जिसकी
उसके ही मार्ग का ध्यान धरो

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डॉ प्रतिभा प्रकाश पुत्री/श्री वेदप्रकाश माहेश्वरी स्थायी पता मो.राधाकृष्ण ग्राम/पोस्ट अलीगंज जिला एटा उत्तर प्रदेश...
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