कविता · Reading time: 1 minute

एक सुबह

एक सुबह देखी मैंने खंजन
तरुवर साख पे वो बैठी थी
नैन बसी कोई अभिलाषा
वो हृदय आस लिए बैठी थी
आते जाते हर पंक्षी को वो
विरल भांति से तकती थी
जैसे कोई लाया हो सन्देशा
फिर निरा उदास वो होती थी
साहस कर एक दिन उड़ बैठी
गगन ऊंचाई जब उसने नापी
प्रसन्न मुख हिलोर हृदय थी
मन मधुवन सावन हरषाया
पाया भान आनन्द गगन का
सुखद अनुभव वो ईश मिलन का
उठ मनुज क्यों तू अलसाया
कर पुरुषार्थ क्यों तू भरमाया
लक्ष्य तेरा है तुझे पुकारे
खंजन भांति तू किसे निहारे
सोच जरा क्यों जन्म मिला है
मानव श्रेष्ठ का देह मिला है
उद्देश्य क्या तेरे जीवन का
किसने प्राण वरदान दिया है
एक मात्र सत्य वही सृष्टि का
अंश उसी का तुझमे खिला है
सत्य प्रेम का विस्तार करो
सर्वोच्च शक्ति का वरदान बनो
सर्वोत्कृष्ट कृति तुम जिसकी
उसके ही मार्ग का ध्यान धरो

2 Comments · 120 Views
Like
45 Posts · 4.6k Views
You may also like:
Loading...