"एक समय भारत मे"

बड़े ज़ुल्मो-सितम वो लाए थे,
जो व्यपार बहाने आए थे.,
रग-रग् मे उनके लालच थी,
और सदियों गुलाम बनाए थे.,
फिर बगावत का आरम्भ हुआ,
सन् 57 मे युद्ध प्रारम्भ हुआ.,
धीरे-धीरे युद्ध बड़ा हुआ,
हर शख़्स युद्ध को खड़ा हुआ.,
जात न कोई धर्म वहा था,
पंजाबी न कोई राजस्थानी.,
जो शख़्स खड़ा था आज़ादी को,
हर शख़्स वहा था हिन्दुस्तानी.,
तब लोहा हमारा वो मान गए,
जब देश की ताकत जान गए.,
फिर रुके नही वो भाग गए,
जब देश के युवा जाग गए.,
उन्हें मुल्क़ से अपने भगाया गया,
जश्न-ए-आज़ादी मनाया गया.,
हर शख़्स था डूबा खुशियों मे,
और तिरंगे को लहराया गया…!

जय हिन्द…
जय भारत…

((( ज़ैद बलियावी)))

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तुम्हारी यादो की एक डायरी लिखी है मैंने...! जिसके हर पन्ने पर शायरी लिखी है...
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