एक शिकायत खुदा से .... ( गजल )

ज़माने को तो शिकायत है हमसे ,
और हमें शिकायत है खुदा तुम से ।
क्या ज़रूरत थी हमें यहाँ लाने की,
रहे सब नज़ारे इस जहां के बेगाने से ।
यह रंग बदलती झूठी ,फरेबी दुनिया ,
हर रिश्तों के चेहरों पर नकाब दोहरे से ।
हम रहे नादां ,न आई हमें दुनियादारी ,
दिल से हम सोचते थे औ वो दिमाग से ।
नाज़ुक सा दिल और यह जहां पत्थर ,
चकनाचूर हुआ बेचारा,ना रहे निशान से ।
हम तो बाज़ आए ,देखो रूह भी घायल है ,
अब निजात दिला दे ‘अनु’ को इस जहां से ,

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