कविता · Reading time: 1 minute

एक लड़की की चाह

चाह एक दबी दबी सी थी
काश मेरा भी एक भाई होता
कभी लड़ती और झगड़ती
और अपनी हर जिद बनवा लेती
पर ये हो ना सका
जब किन्ही बहन भाई को साथ खेलते देखती
थोड़ी खुशी और थोड़े से गम का मेल
नजर आता चहरे पर दबा दबा सा
जिंदगी के पन्ने पलटे और ली कुछ करवट
बचपन के दिन बीते जवानी ने दी दस्तक
मगर चाह अभी भी वही
काश मेरा भी एक भाई होता
हर अनजाने शख्श मे
ढूढ़ती उसकी नजर भाई
मगर अराजक सोच वालों ने
समझ लिया जवानी मे भटके कदम
जब भी किसी शख्स से बात करती
उसमें अपना भाई देख
वो ही समझ लेता जैसे
चाह है जिस्म मे धधकती आग को मिटाने की ।।

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