एक मामूली लड़की -बेटी

हल्की हवा के झोंकों पर
तृण मूल सा वो बिखर जाती,
एक छोटी ख़ुशी से भी
घन तिमिर में चपला सी
वो चमक जाती,
पानी की धरातल पर वो
रेत का घरौंदा बनाती
बिखरने पर फिर से एक
निष्फल प्रयत्न में लग जाती,
लहूलुहान होने पर भी दर्द से
शूल चुभते अतीत के व्यंग से
अधरों पर मुस्कान मधुर वो
नवप्रभात सा खिलाती ,
जीवन की क्या बिसात जो
कठोर कदमो से उसे रोक दे
लफ्जों में कुछ न कहे पर
निश्छल आँखों से हर राज़ बताती,
जमाने की रीत से अनभिज्ञ
आँखों में जिन्दा सपने सजाती
उम्मीदों से उनको पालती सवांरती,
ह्रदय में समेटे दुखों का समंदर
नयनों में असंख्य अश्रु गागर
मर्यादा की ओढ़े चादर वो
रिश्तों की आग पर चलती जाती,
जीवन सम्पूर्ण खोकर
खुद की बलिदानी देकर
क्या मिला उसे? आज सोचा तो
आत्मा की गहराइयों से रो दिया
दिखावे के छल में ,अपनों की खातिर
सपनो को खो दिया ,और फिर भी
जमाना कहता है पराया धन “बेटी”।।
Minakshi mishra

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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