कविता · Reading time: 1 minute

एक बार जन्म लेने दो मां

मैंने इतना किसी को न जाना…
जितना तुम्हें महसूस किया है…
आंख पता नहीं ,कब खुलेगी मेरी..
पर ,मैंने मन की आंखों से तुम्हें, देख लिया है …
पर आज ….तुम्हें यह क्या सूझी,
मेरे होने से तुम्हें क्यों ,
डर महसूस हो रहा है ,
तुम्हारे इस डर से मैं कांपने लगी हूं …
तुम किस पल खुद से जुदा कर,
मुझे गटर में फेंक दो …
मैं बहुत बेचैन हो गई हूं …
ऐसा मत करना ,तुम्हारे पेट में मैं,
वैसे ही विनती की मुद्रा में हूं …
तुम से ही मेरी सांसे ,
तुमसे ही एक आस है …
मैं जीना चाहती हूं ,
तुम्हारी खूबसूरत दुनिया में मां…
तुम्हें देखना चाहती हूं ,
कि तुम जैसा, मेरा क्या है ,
मेरे साथ …
जो सफर कर रहे थे ,कुछ अद् बने जीव ,…
वह पूरे भी नहीं बने थे,
और फिर कतार में लग गए,
कितनी तकलीफ झेली थी, उन्होंने ….
जो नालियों में बहा दिए गए …
मैं सहम गई थी ,
जब कोई टुकड़ों टुकड़ों में काट रहा था …
यह एहसास अब मत होने दो ..
मुझे,मां ….
अपना नहीं तो ,गैर समझकर,
एक बार जन्म लेने दो मां ,….
मुझे एक बार जन्म लेने दो मां….||

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