एक पत्र

मेरे दोस्त
मै जो भी हूँ आज टूटा फूटा
वो भी मै नहीं हो सकता था
मैंने जीना ही नही सीखा था तब
जब कि तुम
आए थे पास मेरे
.
धूप के माने मेरे लिए
केवल रक्त की बुझती प्यास थी
देह का उठता प्रतिरोध,
धूप कि इन किरणों को जाने
कितने आयाम मिल चुके है अब तक
.
हाँ ! मै शर्मिंदा भी हूँ
तुम्हारे लाख माना करने पर भी
मुझे गलत , गलत ही लगता रहा
तुमसे सीखने को मुझे बहुत कुछ था
पर मै सीख ना सका
और अब जब तुम्हारे जाने के बाद
मै कुछ कहना चाहता हूँ तुम यहाँ नहीं हो
.
क्या खेद जैसा कोई भाव
कभी तुम्हें भी सताता है रात को
छप्पर से बाहर लेटे हुए
बिजली के ना जाने से ठीक पहले तक
अंगुलियाँ क्या उठ रही है
अब भी मैसेज टाइप करने को
.
©–सत्येंद्र कुमार

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