एक पत्र अभिभावकों के नाम

एक पत्र अभिभावकों के नाम*

प्रिय अभिभावक!
मेरा प्रणाम स्वीकार करें एवं निवेदन भी!

सीकर में घटित कल की घटना ने हृदय को झकझोर दिया है। हमारी आंखों के सामने अध्ययन के बोझ से तनाव ग्रस्त एक मासूम बच्चा किस तरह हमारी उच्च आकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया!!बहुत अरमानों से एक बच्चे का जन्म होता है। उसके पालन-पोषण में असंख्य परेशानियों के साथ ही सुखद भविष्य के लिए अनगिनत सपने और संभावनाएं जुड़ी होती हैं।एक मां अपने बच्चे में अपना भविष्य तलाशने और तराशने लग जाती है। पिता अपनी अधूरी आकांक्षाएं और असफलताएं अपने बच्चों से पूरी होने के ख्वाब उनके पैदा होने से पहले ही देखने लगता है। अपने खानदान का चश्मोचिराग निश्चित रूप से परिवार का नाम रोशन करेगा,ऐसी धारणाएं बहुत पहले ही पाल ली जाती हैं। सभी अपूर्णताओं की संपूर्णता का एक पुंज मानकर बच्चों का पालन-पोषण किया जाता है।
एक तरफ हम कहते हैं कि माता-पिता निस्वार्थ भाव से बच्चों को पालते-पोषते हैं और दूसरी तरफ हम गुनगुनाते हैं कि मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा! हमारी इसी दोहरी मानसिकता के कारण हमारे नौनिहाल अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं। आकांक्षाएं और अपेक्षाएं हमें सिर्फ और सिर्फ स्वयं से रखने का अधिकार है। सबसे पहले ईमानदारी पूर्वक हम अपने दायित्वों का निर्वहन करें तो बच्चे जब सुनागरिक बनकर जीवन के संग्राम में उतरेंगे तो कभी हार नहीं मानेंगे।
माना कि जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आते हैं, अनेकों परेशानियां और दुविधाएं आती हैं।आज के इस भीषण भौतिक युग में जीवनयापन करना बहुत आसान नहीं है और हम सभी यह चाहते हैं कि हमारा जीवन स्तर उन्नत्त हो और हमारे बच्चे किसी भी प्रकार की कमी नहीं देखें और उनका भविष्य सुरक्षित हो जाए। भला सोचना, सपने देखना या उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रयासरत रहना बुरी बात नहीं है मगर यदि हम इन चीजों को बोझ मान लेते हैं अथवा इनकी प्राप्ति में सन्मार्ग त्यागकर साम,दाम,दंड,भेद की नीतियों को अपना लेते हैं तो भले ही आर्थिक मजबूती हासिल कर लें मानसिक संतुष्टि नहीं प्राप्त कर सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य तो निर्भर करता है सुखद पारीवारिक माहौल में गुणवत्ता युक्त मूल्यपरक शिक्षा के साथ ही सकारात्मक जीवन शैली अपनाकर जीवनयापन करने पर। अतः जन्म के साथ ही बच्चों को दादी-नानी की लोरियां और सुखद-शानदार अतीत की कहानियां सुनने को मिलती रहें और तकनीकी युग की करामात से उनको तनिक दूर रखा जाए तो उनका सामाजिक जीवन और निर्णयशक्ति निश्चित रूप से उत्कृष्ट होगी।
समाज में सभी लोगों का जीवन एक जैसा हो यह जरूरी तो नहीं! क्योंकि सबकी परिस्थितियों और पारिवारिक मूल्यों में अंतर हो सकता है। कुछ लोगों को जन्म के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होने लगती है और कुछ को सबकुछ अपने अनुसार बनाना पड़ता है। ये सब निर्भर करता है हमारे कर्म की ऊंचाइयों पर। यदि हम सोच समझकर पूर्ण साहस एवं आत्मविश्वास पूर्वक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ सही दिशा में कदम बढ़ाएंगे तो जीवन दशाएं अनुकूल बनते समय जरूर लगेगा मगर कुछ परिवर्तन न हो ऐसा नहीं होगा।
हमारा मनोवैज्ञानिक स्तर उन्नत्त होता है और हम लगभग सबकुछ समझते हैं परंतु अज्ञान का नकली आवरण ओढ़े रहते हैं क्योंकि हम सदैव अपनी सोच के गुलाम होते हैं। यहां हमें जरूरत है निष्पक्षता और बेबाकपन की। बच्चों का पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा कोई हंसी खेल नहीं है।यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है जिसे निभाने के लिए नाकों चने चबाने पड़ते हैं। वर्तमान समय में तो और भी कठिन है क्योंकि हमारी प्राथमिकताएं बदल गई हैं, जीवन दृष्टिकोण व्यापक होने की बजाय सिकुड़ गया है। सामाजिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हो गया है। पारिवारिक मूल्यों में गिरावट जारी है। हमारी सोच व्यक्तिनिष्ठ होती जा रही है। अधिकांशतः सुनने में आता है कि भाई मुझे तो अपने काम से काम है अथवा अपने आप से मतलब है! मुझे क्या लेना दुनियादारी से!!! ऐसे ही कई तरह के जुमले हम सुनते हैं और घर में इस्तेमाल भी करते हैं। बच्चों को भी यही शिक्षा देते हैं कि अपना ध्यान रखना, अपने काम से काम रखना, ज्यादा सोशल मत बनना आदि-आदि। इसीलिए जब समाज की गलाकाट मानव-निर्मित स्पर्धा में टिक नहीं पाते तो हाथ में सिर्फ हताशा और अवसाद ही बचता है क्योंकि जब हम किसी के नहीं तो हमारा कौन होगा!!??? कभी गौर करने पर पता चलेगा कि मानव समाज और मानवीय मूल्यों की दिशा भ्रमित होने के कारण तो हम स्वयं ही हैं! कोई एक व्यक्ति बच नहीं सकता इस कलंक से! हालांकि हमारी आदत हो चुकी है कि अपना दामन बचाओ और औरों को फंसाओ! अरे भाई,,, किसी और के लिए आप भी तो और हुए न! तो जो प्रतिकूल परिस्थितियां हमने स्वयं स्वार्थवश उत्पन्न की हैं, उनके नकारात्मक परिणाम भी हमें ही भोगने हैं। सिर्फ हमें ही नहीं, हमारी पीढियां इसके परिणाम भोगेंगी!
समाज के जो वरिष्ठ और जागरूक लोग हैं वो भी आज मौन हैं क्योंकि कोई किसी की सुनने को तैयार ही नहीं है।सबके अपने-अपने तर्क और अपनी-अपनी नैतिकता हो गई है। पुराने समय में कुछ निश्चित नैतिक नियमों का पालन कठोरता पूर्वक सबको करना अनिवार्य था।जो नहीं मानता उसे अन्य तरीके से मनवाया जाता और सामाजिक व्यवस्था निरंतर रहती मगर आज व्यवस्था के नाम पर स्वयं की निजी नीतियों के सिवा कोई और नियम नहीं चलता और स्वच्छंदता के इस स्वनिर्मित ढर्रे पर चलने में हम अपनी शान समझते हैं।
पहले एक व्यक्ति का दुःख या परेशानी संपूर्ण समाज की समस्या हुआ करती थी और आज पीड़ा से तड़पते हुए इंसान को अकेला छोड़कर हम अपने रास्ते चल देते हैं! फिर कौन उबारे हमें किसी कष्ट से! जब हम किसी की सुनने को तैयार नहीं तो हम किसी को सुनाने के भी काबिल नहीं हैं। यही कारण है कि जो हम कर रहे हैं उसका खामियाजा हमारी संतानों को भरना पड़ रहा है।
हमें तुलनात्मक दृष्टिकोण को बदलकर सकारात्मक तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।यह लगभग हमारी प्रवृत्ति बन गई है कि हम पड़ौसियों से, परिजनों से, सहकर्मियों से, सहपाठियों और समस्त अन्य से अपनी तुलना करते रहते हैं। अपनी ही नहीं सबकी! उसके पास यह है, मेरे पास नहीं है। मेरे पास भी होना चाहिए मगर कैसे भी! उसके बच्चे ने यह उपलब्धि हासिल की है, मेरे बच्चे को भी करनी है मगर कैसे भी! अरे भाई,, व्यक्तिगत विभिन्नता भी कोई चीज है! अनेकों परिस्थितियां, कारण एवं कारक तथा कार्य योजनाएं भी कोई चीज हैं!
सबकी क्षमताओं और बौद्धिक विकास में अंतर होता है। हम जो स्थितियां निर्मित कर रहे हैं उनमें बच्चे जो कर पा रहे हैं वो कम नहीं है! फिर भी हम उनपर अपनी चाहतों का बोझ लादे जा रहे हैं।हम चाहते हैं कि हमारी शर्तों पर चलकर बच्चे महान डॉक्टर, इंजिनियर, वैज्ञानिक,शिक्षक, नेता अथवा अभिनेता बन जाएं और विश्व में सफलता के परचम लहरा दें! हम यह नहीं देखते कि हमने सिवाय थोपने के अथवा आर्थिक व्यवस्था के उनको क्या दिया है! न तो अपने बचपन को जीने की आजादी,न अपनी योग्यतानुसार अध्ययन की आजादी,न अपना मनपसंद व्यवसाय चुनने की आज़ादी,न अपनी रुचि की कलाओं को विकसित करने की आजादी और न पढ़ने-लिखने के बाद मनपसंद जीवनसाथी चुनने की आज़ादी! जैसे-तैसे जोड़-तोड़ करके हम बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों में अध्ययन के लिए भेज देते हैं और बार-बार ताकीद करते हैं कि बेटा अपने रास्ते चलना,गलत लोगों की संगत में पड़ जाओगे, ज्यादा फिजूलखर्ची मत करना, दूसरों की होड़ में जिंदगी खराब हो जाएगी आदि-आदि। कभी सोचा है कि हम पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति को अपनाने का दिखावा करते हैं और दिल से अपनी मूल सभ्यता को निकाल नहीं पाते हैं। बेचारे बच्चों के समझ नहीं आता कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।ऐसी स्थिति में अवसादग्रस्त होकर वो सभी रास्ते अपनाने को बाध्य हो जाते हैं जिनमें उनका भला नहीं है।इस प्रकार यह अनिर्णय और दुविधाएं उनको गलत दिशा में ले जाते हैं और हम आखिरकार किस्तम को ही दोषी करार देते हैं,स्वयं अपना आत्मावलोकन नहीं करते हैं कि हमने अपने आतंक के साए में स्वयं ही बच्चों को दोराहे पर खड़ा किया है।
अभी भी समय शेष है। हालांकि हमने ये कोचिंग के कारखाने खोलकर गला काट प्रतिस्पर्धा के दौर को स्वयं आमंत्रित किया है।
छोटे-छोटे बच्चों को स्वयं से दूर छात्रावासों में छोड़ कर हम कैसे अपने सुखद भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। रोज मानसिक तनाव में आकर कोई न कोई प्यारा बच्चा अपनी जान दे देता है। और हम सिर्फ अफसोस ही जाहिर करते हैं। बच्चों की जिंदगी और उनका संपूर्ण स्वास्थ्य हमारे समाज के लिए बहुत उपयोगी है। भौतिक चकाचौंध की चाहत में हम अपने सुखद भविष्य की बलि देने को तैयार हैं। हम सिर्फ यह सोचें कि बच्चे को खूबसूरत व्यक्तित्व का मालिक कैसे बनाएं! उसमें मानवीय मूल्यों का बीजारोपण कैसे संभव है! समाज एवं देश के प्रति भक्ति एवं समर्पण की भावना का विकास कैसे होगा! उसके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए कौन-से कदम उठाने चाहिएं! उसके लिए लोकाचार एवं लोक व्यवहार कितने उपयोगी हैं! उसके शारीरिक एवं मानसिक सौष्ठव के लिए सभी कारगर उपाय कीजिए मगर शत् प्रतिशत परीक्षा परिणाम के बोझ तले मत दबाइए! उसे प्राकृतिक एवं सुखद वातावरण में पलने-बढ़ने दीजिए। वो जैसा पढ़ेगा, अच्छा पढ़ेगा! बस गुरु का चुनाव आपकी जिम्मेदारी है। शेष तो प्रकृति प्राणीमात्र को सबकुछ स्वत: बख्श देती है। आप चिंता न करें। बच्चों को सुसंस्कृत बनाएं मशीन बनाने का काम न करें! उनको जीवन की वास्तविकता समझने का अवसर दीजिए। फिर देखिएगा कि आप का भविष्य सुखद होता है कि नहीं! वरना तो आज आप दबाएंगे,कल वह आपको वृद्धाश्रम छोड़ कर आ जाएगा तो अतिशयोक्ति न होगी।
अतः बच्चों को पूर्णतः प्राकृतिक और संतुलित वातावरण उपलब्ध करवाएं ताकि वे भी जीएं और आप भी प्रसन्न रहें।
आशा है कि आप मेरे शब्दों का मर्म समझेंगे और मेरी भावनाओं से सहमत होने का प्रयास करेंगे!
सादर!
आपकी शुभचिंतक
*विमला महरिया “मौज”*
लक्ष्मणगढ़ (सीकर) राजस्थान

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