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एक नारी की मन की वेदना

एक नारी की मन की वेदना
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जब तक तुम न हो बिस्तर पर,
मुझे जरा भी नींद नहीं आती।
जब तक मिले न स्पर्श तुम्हारा,
मेरे दिल में चैन नहीं है आती।।

जब तक तकिया न तुम्हारे हाथो का,
आंखो मे नींद नहीं है समाती।
जब तक चादर पर न पड़े सलवटे,
मेरे दिल को चैन कभी नहीं आती

मिल जाता है जब स्पर्श तुम्हारा,
मै मधुर स्वप्नों में हूं खो जाती।
इन मधुर स्वप्नों के द्वारा सदैव,
मै तुम्हारे करीब पहुंच जाती।।

अब तुम मेरे प्राणों से प्यारे हो,
मेरे दिल के तुम राजदुलारे हो।
कब होगा तुमसे मिलन मेरा,
मेरी आशा के चांद सितारे हो।।

चैटिंग करती हूं जब मै तुमसे,
शब्दों से स्पर्श होता है मेरा तेरा।
चलती जब उंगलियां मोबाइल पर
पा जाती हूं मै ढेर सा प्यार तेरा।।

जब तक संदेशा तुम्हारा न आये
तब तक मै भी नही सो सकती।
करती रहती हूं उसकी प्रतीक्षा मै,
तब तक विश्राम नहीं कर सकती।

बनारस में नहीं रहा अब रस,
गंगा में नहीं रहा स्वच्छ पानी।
बनारसी बीड़ा न मिलता अब,
बुलालो अपने पास तुम जानी।।

तड़फ रही हूं मै बिन तुम्हारे,
दिल मेरा यहां नहीं अब लगता।
आन मिलो सजना तुम मेरे,
अब दिन भी नहीं यहां कटता।।

कहने के तो बहुत कुछ अब है,
लज्जा बस कुछ न कह पाती।
तुम तो स्वयं समझदार हो स्वामी,
मुझे समझाने की नोबत न आती।

आर के रस्तोगी गुरुग्राम

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