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एक तानाबाना बुन कर देखो न

Yatish kumar

Yatish kumar

गीत

November 6, 2017

एक तानाबाना बुन कर देखो न

एक तानाबाना बुनकर देखो न
मेरे आँगन में तुमने क़दम रखा
अब थोड़ा चलकर देखो न
तुम मुझसे गुज़र कर देखो न

मेरी दुनिया बस छोटी सी है
मुझ से होकर तुम तक ही है
मेरी दुनिया में आ कर देखो न
तुम इसे सज़ा कर देखो न

हमने जीवन में जो सपने बुने
रस्ते में रुक कर जो गुहर चुने
उन मोती से जो माला बने
तुम धागा बन कर देखो न

मैं बैठा हूँ प्यासा कब से
भूखा हारा खारा कब से
अपनी मीठी मुस्कानों से
तुम हाला बन कर देखो न

तुम आयी हो संध्या सी है
मन में मेरे जिज्ञासा भी है
मन के अंदर के अंधेरे में
तुम दीप जला कर देखो न

तुम मुझसे लिपटकर देखो न
तुम मुझमें सिमट कर देखो न
मैं थोड़ा और सुलझ जाऊँ
तुम मुझसे उलझ कर देखो न

यतीश ५/११/२०१७

Author
Yatish kumar
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