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"एक चाह"

चाहा नहीं चाह को ,
चाह के चाहने की
ये तो रूह में बसी खुशबु है,
खबर इसको कहाँ, ज़माने की.
**
देखा तुम्हें, सोचा तुम्हें, चाहा तुम्हें
हद तो तब हुई, जब देखा,मैने मुझमें
तुम ही तुम थे,
मैं बची थी कहाँ .
***
किस्मत से मिलते हैं,
चाहने वाले
तलब सिर्फ सुकून कि होती है
तलबगार का नाम,
चाहें जो भी दो

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Vaishali Rastogi
Vaishali Rastogi
SAMBHAL. MORADABAD
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मुझे हिंदी में काफी रूचि है. विदेश में रहते हुए हिन्दी तथा अध्यात्म की तरफ...
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