कविता · Reading time: 1 minute

एक चाँद को आज मैने

एक चाँद को आज मैने
दिन के उजाले देखा है
चँद्रमा पे जो कुछ भी है
एक दाग दिखाई देता है
पर ‘अंबर’ के इस चाँद पर
कोई दाग न मैने देखा है ।
हाँ मगर उसके दाहिने कपोल पर
अधरों से तनिक नीचे
एक छोटा सा तिल काला
जरूर मैने देखा है ।
वो चाँद भी पूनम का है
और चाँदनी पूनम से बडकर,
मगर वो चाँद दिखाई न पूरा देता है
क्योकि घटाओं सी जुल्फों ने
उसके बाँए कपोल को घेरा है ।
तनिक से मखमली बालों को
चंद्रमुख से परावर्तित किरणो के सँग
प्रणय करते भी मैने देखा है ।
वो घनघोर घटाएँ है या छाई है निशा
पुँज प्रावर्तित उन लटाओं से
प्रदीप समक्ष दिखाई देता है
इस धरा पर कल्पना या हकिकत में
एक ब्रह्माण्ड सा मैने देखा है ।
वो चाँद शायद किसी मन की तलाश है
किसी का दिल भी उसके लिए
धङकते कई बार मैने देखा है
किसी के सावन के उस चाँद को
किसी की आँखों मे समाए
आईने में आज मैने देखा है

देवेन्द्र दहिया-‘अंबर’

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