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एक कुर्सी

घर में परा है एक कुर्सी,
टाँग टूट चुकी है जिसकी;
बैठ नहीं सकता है वह,
किसीको बिठा भी नहीं पाता वह;
उसकी मरम्मत हो नहीं सकती,
उम्र ढल चुकी है उसकी;
सहारा कोई नहीं देता उसको,
शायद उसकी जरूरत नहीं किसीको ।

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Bikash Baruah
Bikash Baruah
Guwahati, Assam
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मैं एक अहिंदी भाषी हिंदी नवलेखक के रूप मे साहित्य साधना की कोशिश कर रहा...