*एक कविता "माँ" को समर्पित*

जग में था जब जन्म लिया तब खूब मुझे सहलाया था ।
जीवन का कुछ पता नहीं उस आँचल में सुख पाया था ।।
पहली दफा जब उसे पुकारा माँ ही माँ मन रटता गया ।
यही है मेरी जननी देवी कोमल दिल तब खिल सा गया ।।
माँ के कारण जग में आया माँ से होती है पहचान ।
माँ से बढ़कर कुछ नहीं जग में जितने पूजो तीर्थ स्थान ।।
ना सह पाती दूरी वो ना ओझल होने देती माँ ।
इतना लाड़ ना कोई करता आंच ना आने देती माँ ।।
क्रोध भी उसका प्यार लगे वो शिक्षा देती हमें महान ।
माँ से बढ़कर कुछ नहीं जग में जितने पूजो तीर्थ स्थान ।।
खड़ा हूँ आज मैं पैरों पर आशीष जो तेरा संग है माँ ।
ज्ञात है मुझको सब कुछ अब भी सहे जो तुमने कष्ट हैं माँ ।।
भूखी प्यासी तू रहती थी कभी ना भूखा मैं सोया ।
बना वृक्ष फलदार मैं आज पेड़ यह तूने खुद बोया ।।
देखे अपने चाहने वाले भूला भटका सुबह से शाम ।
माँ से बढ़कर कुछ नहीं जग में जितने पूजो तीर्थ स्थान ।।
ना कोई अपना ना पराया ना कोई होते अपने खास ।
माँ ही जाने दर्द हमारा चाहे जिस पर रख लो आस ।।
दुखाना ना कभी दिल इस माँ का बसे हैं माँ में कई भगवान ।
माँ से बढ़कर कुछ नहीं जग में जितने पूजो तीर्थ स्थान ।।

शिवालिक अवस्थी, धर्मशाला, हि.प्र. ।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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