एकाकी

वो आता उषा के संग ,
किरण आसरा पाता ।
संध्या के संग हर दिन ,
दिनकर क्यों छुप जाता ।

तजकर पहर पहर सबको ,
वो एकाकी चलता जाता ।
हर प्रभात का दिनकर ,
संध्या दामन ढल जाता ।
…. विवेक दुबे”निश्चल”@…

Like Comment 0
Views 3

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing