ऋतु वसन्त जो आई

फिर ली करवट मौसम ने यूँ, गूँज उठा जग सारा है ।
दस्तक दी ऐसी मनमोहक, वाह क्या ख़ूब नज़ारा है ।।
बीते कुछ दिन पिछले मानो, छिपे कहीं हम बैठे थे ।
मौसम के भी तेवर भारी, नित दिन स्वांग रचाते थे ।।
बड़े दिनों के बाद यूँ जैसे, फिर से रौनक आई है ।
महक उठी हर दिशा धरा की, ऋतु वसन्त जो आई है ।।
पीली खेती सरसों की, क्या अद्भुत दृश्य सँवारा है ।
क्या कहने हैं कुदरत तेरे, धरा पे स्वर्ग उतारा है ।।
कला की देवी नमन है तुमको, राग प्यार के गाएँगे ।
मधुर तान की वीणा से, नफ़रत के बीज मिटाएँगे ।।
आशीष मिले उस देवी का, यह रंगत जिसने लाई है ।
महक उठी हर दिशा धरा की, ऋतु वसन्त जो आई है ।।
प्रतीक यह होती उड़ती पतंग, स्वभाव शांत दर्शाती है ।
इंसान, पशु और पक्षी में, नव चेतन उभर के आती है ।।
भर गए देखो पेड़ और पौधे, धन्य सभी कहलाएँगे ।
इस ऋतु के पंचम शुक्ल के दिन, कई शूरवीर याद आएँगे ।।
आओ मिटाएँ भेद दिलों के, खुशी लौट के आई है ।
महक उठी हर दिशा धरा की, ऋतु वसन्त जो आई है ।।

शिवालिक अवस्थी, धर्मशाला, हि.प्र ।

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