गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ऊपर से चाहें तुम हँसते रहते हो

ऊपर से चाहें तुम हँसते रहते हो
दर्द पता है अंदर अंदर गहते हो

राह दिखाती माँ की बातें जीवन भर
अगर सभी वो अपने मन में तहते हो

विरह अगर अपनों का सहना पड़ता है
दिल पर पत्थर रख तुम ये सब सहते हो

भाव बता देते हैं सब कुछ चहरे के
मुँह से चाहें बात नहीं कुछ कहते हो

चाहें मिले ख़ुशी तुमको या कोई गम
आँखों से बस चुपके चुपके बहते हो

हार अर्चना मान मुश्किलों से क्यों तुम
खड़ी इमारत उम्मीदों की ढहते हो
डॉ अर्चना गुप्ता

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