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उड़ान

satyendra agrawal

satyendra agrawal

कविता

July 3, 2017

मन उमंगो के आसमान में उड़ने लगा
राहे स्वयं राह दिखाने लगी
राते स्वयं रोशन होने लगी
जब से मिली हो तुम
जिंदगी स्वयं मुस्कराने लगी
मन कहता है
पहाड़ो की वादियों में ढलती शाम हो
शाम के झुरमुट में पेड़ो के लम्बे साये हो
नदी के कलकल संगीत में
बहती समीर हो,बहती समीर में
तुम्हारा लहराता आँचल हो
आकांषये यो बढ़ने लगी
जिंदगी स्वयं मुस्करानी लगी

डॉ सत्येन्द्र कुमार अग्रवाल

Author
satyendra agrawal
चिकित्सा के दौरान जीवन मृत्यु को नजदीक से देखा है ईश्वर की इस कृति को जानने के लिए केवल विज्ञान की नजर पर्याप्त नहीं है ,अंतर्मन के चक्षु जागृत करना होगा
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