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उड़ान भरने दो !

रोको मत आज इन्हें, आवाज़ उठाने दो
सदियों से ख़ामोश लबों पे, कुछ लफ्जों को इतराने दो,
रोको मत आज इन्हें कुछ खुल के प्रतिकार जताने दो,
इनके बोझिल कँधों पे नए पर उग जाने दो,
हौसलों का आग़ाज़ है ये, उड़ान भरने दो,
कुछ मुखर कुछ बुलंद स्वरों को पहचान बनाने दो।
बहुत मुमकिन है, खतरों से भी लड़ना-भिड़ना परे,
अपने पर और आवाज़ को काटों की सियासत में उलझाना परे,
लक्ष्य विहीन होने में मज़ा क्या? मज़ा तो लक्ष्य पे मिट जाने में है,
आज रोको मत इन्हे, खुले आसमाँ में उड़ान भरने दो !
***
9 /12 /2018
मुग्द्धा सिद्धार्थ

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