.
Skip to content

उड़ता पंछी

Shubha Mehta

Shubha Mehta

कविता

November 26, 2016

मैं , उड़ता पंछी
दूर -दूर
उन्मुक्त गगन तक
फैलाकर अपनी पाँखें
उड़ता हूँ
कभी अटकता
कभी भटकता
पाने को मंजिल
इच्छाएँ ,आकांक्षाएँ
बढती जाती
और दूर तक जाने की
खाता हूँ कभी ठोकरें भी
होता हूँ घायल भी
पंख फडफडाते है
कुछ टूट भी जाते हैं
फिर कोई अपना सा ..
कर देता है
मरहम -पट्टी
देता है दाना -पानी
जरा सहलाता है प्यार से
जगाता है फिर से प्यास
और ऊपर उड़ने की
और मैं चल पडता हूँ
फिर से पंख पसार
अपनी मंजिल की ओर ….।

Author
Shubha Mehta
Recommended Posts
इंसानियत इंसान से पैदा होती है !
एक बूंद हूँ ! बरसात की ! मोती बनना मेरी शोहरत ! गर मिल जाए, किसी सीपी का खुला मुख, मनका भी हूँ... धागा भी... Read more
मुक्तक
होते ही शाम तेरी प्यास चली आती है! मेरे ख्यालों में बदहवास चली आती है! उस वक्त टकराता हूँ गम की दीवारों से, जब भी... Read more
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है मगर छन भी आती कहीं रोशनी है न करती लबों से वो शिकवा शिकायत मगर बात नज़रों से... Read more
दूरी बनाम दायरे
दूरी बनाम दायरे सुन, इस कदर इक दूजे से,दूर हम होते चले गए। न मंजिलें मिली हमको, रास्ते भी खोते चले गए। न मैं कुछ... Read more