"उर की पुकार"

सामाजिक ताना बाना ऐसा बुना गया है जो मनुष्य की सुविधा, सुरक्षा, समरसता बनाये रखे साथ ही उच्च मानवीय एवं चारित्रिक मूल्य स्थापित हो सके, किंतु कई बार ये व्यवस्था किसी के लिये पीडादायक हो जाता है. मेरी प्रस्तुत रचना एक लड़की की विवाहोपरान्त भावना का चित्रण है जिसके लिये विवाह का अर्थ सुख नहीं है. ………

काट कर अपनी जडे, सींचने आई तुम्हे,
रक्त और मांस से सिंचित किया तुम्हे,
न दिया तुमने मुझे खाद पानी,
श्वांस फ़िर भी मैं लेती रही,
रोम-रोम से कृतज्ञता अर्पित किया,
प्रतिपल स्वयं से स्वयं को वंचित किया,
छोड कर माता -पिता का दुलार,
तुम पर स्नेह लुटाया अपार,
कर देते उपकार मुझपर एक बार,
सुन लेते टीस भरी उर की पुकार,
उर की पुकार………उर की पुकार.

………निधि………

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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