उर का कान्हा.....

*चंद दोहे*

कठिन स्वयं को जानना,सचमुच मेरे मीत.
बिनु जाने ख़ुद को सरस,मिले न दुख पर जीत.
०००
कौन है अपना दोस्तो,कौन पराया यार.
आता ना हमको समझ,लोगों का व्यवहार.
***
उलझे हम ख़ुद में हुये,कहते अक़्सर लोग.
बने न अब तक प्रीत के,इसी वज़ह से योग.
०००
सच पूछो तो हम जिन्हें,करते दिल से प्यार.
उनसे ही पग-पग हमें,मिलता बस दुत्कार.
०००
उर का कान्हा ढूँढ़ता,बस राधा सी प्रीत.
मगर न अब तक पा सका,गोरी का दिल जीत.
*सतीश तिवारी ‘सरस’

Like Comment 0
Views 21

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share