बीते साल पचास नहीं घबराना तुम

बीते साल पचास नहीं घबराना तुम
नया दौर ये हँसते हुये बिताना तुम….

माथे पर छाई हों लटें रुपहली सी
आंखों में भी चमक लगे कुछ फीकी सी
दिखने लगे लकीरें भी कुछ चेहरे पर
और रहे मुस्कान न पहली मीठी सी
तन में चाहें हों कितने भी परिवर्तन
दिल को लेकिन बूढ़ा नहीं बनाना तुम
नया दौर ये हँसते हुये बिताना तुम….

लगे कि पूरी हुईं सभी जिम्मेदारी
सोच पुरानी बातें ये दिल हो भारी
लगे गँवाया यूँ ही ये जीवन सारा
लगे ज़िन्दगी की बाजी हारी हारी
अभी कहानी बाकी है कब खत्म हुई
अपने मन को बस इतना समझाना तुम
नया दौर ये हँसते हुये बिताना तुम….

नये पुराने मीत ढूंढ लाना होगा
बचपन के भी पास जरा जाना होगा
ढूढ़ ढूंढ कर कोनों कोनों से खुशियाँ
अपने मन को खुद ही बहलाना होगा
सैर सपाटे को भी कुछ बाहर निकलो
थोड़ा धन अब खुद के लिये लुटाना तुम
नया दौर ये हँसते हुये बिताना तुम……

दुनिया माना बेगानी सी लगती है
बच्चों से दूरी भी मन को खलती है
बहुत अकेलापन सा खुद में रहता है
ढ़ीली ढीली सी भी तबियत रहती है
हो जाओ तन से भी तुम मजबूर कभी
मन से लेकिन देखो टूट न जाना तुम
नया दौर ये हँसते हुये बिताना तुम……

08-01-2018
डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद

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