Jan 2, 2021 · कविता

उफ्फ ये कोरोना!

उफ्फ ये कोरोना!
कोरोना,कोरोना,हम पर ये सितम मत करोना,
कितनो की जान ले चुके हो तुम,
अब तो ये मृत्यु तांडव बंद करोना।
एक विषाणु हो तुम , अपना विष फैला रहे हो,
मानव जाति पर तुम एक खतरा बनकर मंडरा रहे हो।
लेकिन तुम ये जान तो तुमसे लड़ने के लिए हम जान की बाज़ी लगा देंगे,
नामोनिशान तुम्हारा दुनिया के नक्शे से मिटा देंगे।
तुमसे हम सबको नित नित महासंग्राम लड़ना है,
आत्मसुरक्षा करते हुए जीवनपथ पर आगे बढ़ना है।
डिस्को लाइट से दिखते हो,
सबको अपनी धुन पर नचा रहे हो,
खुद को मुगलेआजम और
हम सबको अनारकली बनाकर मज़े उड़ा रहे हो।
सब दे रहे हैं तुमको गिन-गिन कर ताने
क्या क्या कर रहे हैं लोग कोरोना के बहाने-
कोई झाड़ू तो कोई कर रहा है पोछा,
मिलकर संभाल रखा है पूरे परिवार ने मोर्चा।
खुश हैं बच्चे के वो अपने मम्मी-पापा के साथ हैं,
अब ना दिन,दिन है,ना ही रात,रात है।
समय कठिन है,रास्ता लंबा है अँधेरो से हो कर जाना है,
इरादे बुलंद हैं हमारे, इस आग के दरिये में डूबकर पार जाना है।
हिम्मत है हम में, हम अपनी नैया पार लगाएंगे,
कोरोना की हस्ती को हम अपनी दुनिया से मिटायेंगे,
फिर लौटकर आएंगी बहारें,
फिर चलेंगी दरिया में पतवारें,
देख लेना हम सब फिर खिलखिलायेंगे,
मुस्कुराएगी ज़िंदगी,फिर हम ज़िंदादिल बनजाएँगे।

सोनल निर्मल नमिता

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