मुक्तक · Reading time: 1 minute

उपेक्षित

*मुक्तक*
मरुस्थल स्वार्थ का फैला नहीं कोई ठिकाना है।
उपेक्षित को सदा उम्मीद की कुटिया बनाना है।
जगत दाबे करे हमदर्द बनने के हजारों पर।
उन्हें तो भाग्य के आगे हमेशा सिर झुकाना है।
अंकित शर्मा’ इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ,सबलगढ(म.प्र.)

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