उपमा

तुझे उपमा दूँ तो आखिर किसकी
उपमा से भी तू अनुपम
अनुपमता में हीं मैं भटका
कैसे करूँ , मैं तेरा वर्णन ।।

बर्फ के भीतर से रश्मि,
छन कर आती वैसा कहूँ
बर्फ पर बिछी चाँदनी या
चाँदनी को बिंदिया कहूँ ।।

तेरे लहराते आँचल को
बादल कहूँ या केशों को
मृग सा बना, इधर~उधर मैं
तुझको हीं ढूँढा करूँ ।।

तुम हीं कहो, तुम कौन हो मेरे
सांसों की डोर हो, या ज़िन्दगी का झंकार मेरे
मुझ कमल पर सोई शबनम या सागर की तृष्णा कहूँ
अलसाई रात की ठण्ड हवा, या प्रेम की ज्वाला कहूँ ।।

……..अर्श

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