गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

उन्हें मोहब्बत-ए इज़हार करने को जी चाहता है

उन्हें मोहब्बत-ए इज़हार करने को जी चाहता है
जो ज़िन्दगी है मेरी और मंज़िल का रास्ता है

गुनाह जो कर दिया है कमबख्त दिल लगाने का
अब तो सुकून-ए-दर्द और बेचैनियों से वास्ता है

दिन का चैन,नींद रातों की न जाने कहाँ खो गयी
बिना दीदार साजन के बावरा मन न मानता है

छु लू चाँद को उचक के दिल से आवाज़ आई है
मुस्कुराता हुआ जो एक टक मुझे रोज़ ताकता है

हक़ीक़त क्या बताऊ अब मैं नगमे गुनगुनाने की
रह रह कर ये पागल मन बस उनको ही माँगता है

इक सच्ची मोहब्बत की तलबगार इस क़दर कि
आईने-ए-दिल की कश्ती को मन बार-2 परखता है

समय है सुन ‘पूनम’ अब इक़रार-ए-मोहब्बत का
क़ुबूल कर ले जो भी तेरी मोहब्बत-ए-दास्ताँ है

— पूनम पांचाल —

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