उन्हें बसाया दिल में

धरा अपनी कभी सोना, कभी चाँदी उगलती थी /
गजनबी लंग जाफ़र के कयामत को निरखतीथी/
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उन्हें बसाया दिल में इंतजार करते हैं/
उन्हे भुलाया मन से मगर प्यार करते हैं/
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गर ज़मीं चाँद बन यों बिखरना अगर तुम
तुझे मेरी प्यासे बुझाना ही होगा /
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प्रेमी बनकर सदा याद आते हो जब,
मुझको जिगर मे बसाना ही होगा /
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मन ख्वाबों का ऐसा समुंदर बहा कर
यामिनी चाँदनी बन आना ही होगा/

राजकिशोर मिश्र ‘राज’ प्रतापगढ़ी

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