उनींदे से भटकते मेरे अब अरमान लगते हैं गज़ल

उनींदे से भटकते मेरे अब अरमान लगते हैं
कभी बेचैन लगते हैं कभी नादान लगते है

जहानत ही नहीं काफी ज़माना जीतना हो तो
झुके सर तो मशीखत की सदा पहचान लगते है

सभी भूले हुए जीवन के सुख दुःख याद आते है
कभी वो फूल लगते हैं कभी पैकान लगते है

नज़ारे गाँव के बीता हुया कल हो गए अब तो
वो गलियांऔर पनघट अब मुझे वीरान लगते है

छुपे बैठे हैं पलकों में न जीने चैन से देते
वो मेरे ख़्वाब ही मुझ को कहीं शैतान लगते है

कई हैं मंजिलें सोची कई हैं रास्ते अपने
वो छूने मील के पत्थर नहीं आसान लगते है

कोई कंधा मिला होता हमें सर रख के रोने को
खुशी दी जिनको’ मेरे दुख से’ वो अनजान लगते है

उफनते सागरों के दर्द कोई क्या भला जाने
जो उसके गर्भ में उठते कई तूफ़ान लगते है

जहां वाले कभी निर्मल परों को आजमाते है
बडी हैरत सी होती है जरा नादान लगते हैं1

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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी],...
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