उनकी बेरुखी

जिनको हम नज़रो में समा बैठे है,
वही मुझको नज़रो से गिरा बैठे है!
जिनकी आंखों से लिपटा था काजल की तरह,
वही अपना काजल बहा बैठे है!
जिनपर हम सारी खुशियाँ लूटा बैठे है,
वही आज मुझको भुला बैठे है!
खाई थी क़सम साथ निभाने की जिनसे,
वही आज दामन छुड़ा बैठे है!
हम जिनको क़िस्मत की लकीर बना बैठे है,
वही मेरी ज़िंदगी मिटा बैठे है!
जिनको यादो में भी मेरा आना पसन्द नही,
हम उनकी यादों से भी दिल लगा बैठे है!

(((ज़ैद बलियावी)))

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