कविता · Reading time: 1 minute

उदासियाँ

रोज जीतने की कोशिश करती हूँ,
पर रोज हार जाती हूँ।
तेरी उदासियों के सबब से,
रोज खार खाती हूँ।
क्यूँ समझते हो तुम अकेला खुद को,
मैं भी तो हूँ,जो साथ तुम्हारे चलती जाती हूँ।
तेरी उदासियाँ मुझे अंदर तक तोड़ देती हैं,
मेरी खुशियों का रुख ही मोड़ देती हैं।
तब मैं तेरी उदासी से हार जाती हूं ।
कितनी बार समझाया तुम्हें कि,
कोई न हो तो अपने अकेलेपन से दोस्ती कर लो,
पर तुम्हें समझ कहाँ आता है,
कभी हम जैसा सोचते हैं ,
वैसा कब हो पाता है।
तेरी परेशानियों के डर से ,
कभी कभी मैं भी डर जाती हूँ।
खुद को क्यूँ समझते हो तन्हा,
मैं हूँ न जो इस सफर में,
तेरा हाथ थामे चली जाती हूँ।
जरा सोचो जिस उदासी और अकेलेपन से तुम आज गुज़र रहे हो,
कितने सालों और कितने महीनों से मैं भी गुज़रती जाती हूँ।

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