उड़ान

लघुकथा ” उड़ान “
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” उड़ान” चाहे बचपन से लड़कपन में प्रवेश करते सपनों की हो ….या बाली उमर के सोलहवें साल की हर एक को सपनों की हसीं दुनिया में ले ही जाती है ……. ।
बचपन से जवान होते सपनों में जब ….सोलहवां सावन दस्तक देने लगता है तो ….जिंदगी में इन्द्र धनुषी रंगों की बरसात…. सतरंगी सपनों को एक नई उड़ान देने लगती है । और तरह-तरह के अतरंगी सपनों के बीच कोई एक रंग दिल की गहराइयों में अनजाने ही उतर कर सपनों की उड़ान को परवाज़ देने लगता है।
ये कहानी किसी एक नायक और नायिका की नहीं …. बल्कि हर इंसान की ….. हम सब की है ……
मेरी भी है ….और ये, मत भूलिए की आपकी भी तो है।
आप उस एहसास को याद कीजिए …..! जब आपके जवां होते सपनों की उड़ान को परवाज़ मिली थी ।और
कोई रंग आपके दिल को अपने रंगों से सराबोर कर गया था ……. मदहोश कर गया था …….।
अंत चाहे सभी का एक-दुसरे से जुदा हो सकता है ,पर आगाज तो उन्हीं इन्द्र धनुषी सपनों की उड़ान से ही हुआ था …. हुआ है …. और आगे भी हमेशा … होता ही रहेगा । जब पंछियों की तरह ही मेरे और आपके मन ने भी मिलन के सपने सजाए उड़ान भरी ….. और अपने महबूब के दिल में दस्तक दी थी । आज आपकी उम्र ने चाहे कितने पड़ाव पार कर लिए हों मगर … उनका जिक्र आते ही वो चमक आज भी आपकी “आंखों में ” नज़र आ रही है ।और यकिन न हो तो अभी आइने के सामने जाकर अपनी आंखों में झांक कर देखिए वो चमक भी नजर आ जाएगी ….. और वो उड़ान भी……!!
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” गौतम जैन “
हैदराबाद

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