उक्सा रहा है

कोई तो है मेरे अन्दर जो मुझे उक्सा रहा है
अनाप -शनाप बेबह्र गज़लें लिखवा रहा है ।
चाहता मैं भी हूँ कि लिक्खूं अदब कायदे से
और वो जेहन को मेरे खिलाफ भड़का रहा है ।
पता नहीं क्या बीगाड़ा है मैनें उसका यारों
पुरखों की मेहनत को मिट्टी में मिला रहा है।
बेहद शर्मिन्दा हूँ मैं अपनी इस लाचारगी पर
और वो अपनी कामयाबी पर मुस्कुरा रहा है ।
बेवकूफ समझा है क्या तूने अजय लोगों को
अरे ये क्यों नहीं कहते तुम्हें भी मजा आ रहा है ।
-अजय प्रसाद

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