ईश्वर के आंसू (कथात्मक काव्य)

ईश्वर = हर बस्ती हर झुग्गी हर झौपड़ी में धुआं धुआं सा क्या है..

मनुष्य = आग लगी है आग लगी है –

ईश्वर = ये कैसी आग है भाई !
धुआं धुआं है पर आग दिखती नहीं

मनुष्य = ये पेट की आग है जलती है पर दिखती नहीं….

ईश्वर = धुआं उधर है तो इधर रोशनी में असंख्य दीप क्यों शासक जला रहा….

मनुष्य = ये असंख्य दीपक नहीं गुलामों की गिनती है भाई….

ईश्वर = भगवान सबको देखेगा…

मनुष्य = भगवान सबको नहीं देखता भाई !
इसलिये तो शासक आत्ममुग्ध बंसीधर बन गया…

ईश्वर = हुँँ….

मनुष्य = नासमझ दीप जला रहे
पटाखें फोड़ रहे
यह देख…
उधर भुख से बिलबिलाते बच्चे जवान बुढे
घृणा नफरत के दीये जला बैठे
तो गलत क्या है भाई…।

ईश्वर = हुँ…

मनुष्य = काश शासक भुखे को एक संध्या भोजन देने की बात करता…..
अंधभक्त की भक्ति सफल हो जाती भाई…

ईश्वर = लेकिन…

मनुष्य = लेकिन परन्तु कुछ नहीं होता भाई….

ईश्वर भी आंखों से आंसू छिपाता विलिन हो गया…।

आग है आग है आग है…. ।।

~रश्मि
5-4-20

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