ईर्ष्या

दोहे।ईर्ष्या।

ईर्ष्या दुख की बावली,,,,,,,जो उर रखो सजोय ।
मान हानि धन धर्म की,,,,, तन की दुर्गति होय ।।

ईर्ष्या मन का रोग है,,,,,,,, करो त्वरित उपचार ।
देख विरोधी का भला,,,,,,, खुद पर करे प्रहार ।।

ईर्ष्या की औषधि अमिट, मन में रही जो व्याप्त ।
राम योग सन्तोष से,,,,,,,,,, दैनिक ध्यान प्रयाप्त ।

©राम केश मिश्र

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