कविता · Reading time: 1 minute

ईमारत है ये…सदियों से ऐसी ही रहे!!

जूठ,फरेब,मक्कारी से दूर
स्वार्थ,अज्ञानता,तिरस्कार को भूल
सबकी सुने,किसी से कुछ ना कहे
ईमारत हैं ये,
सदियों से ऐसी ही रहे!
कई राज़ों को खुद में समेटे
पीढ़ियों को सामने से देखे
गुज़रती चली जा रही हैं ये
ईमारत हैं ये,
सदियों से ऐसी ही रहे!
किसी ने चोट पहुंचाई
किसी ने मरम्मत करवाई
किसी ने की खूब लड़ाई
प्यार,स्नेह,लाड भी पाई
सबकी सुने,किसी से कुछ ना कहे,
ईमारत हैं ये
सदियों से ऐसी ही रहे!
बनाया हैं एक ईमारत
स्वयं करूणानिधि ने भी
स्त्री और पुरुष के मेल से
जूठ,फरेब,अज्ञानता से रखें खुद को दूर
यही यह शाश्वत ईमारत है
जिधर से चलता रहता है
जीवन-मरण का विधान
सृष्टि के रहने तक।
ये शरीर भी ईमारत हैं एक
सदियों से ऐसी ही रहे!
अब हमें करना ईश्वर प्रदत्त
ईमारत का सद्कर्म,सद्गुणो से
रख रखाव,ताकि सुरक्षित हो सके
ये जीवन हमारा जन्म-जन्मान्तर तक,
ईमारत है ये
सदियों से ऐसी ही रहे!!

®आकिब जावेद

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