गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ईंटों का ढांचा भी घर लगता है…।

सदियों सा सिर्फ एक पहर लगता है,
पानी सादा भी अब तो ज़हर लगता है।

आँखें भारी है कुछ नशे सा आलम है,
कल की ही नज़र का असर लगता है।

इस शहर में बेखुदी का आलम न पूछो,
अखबार भी अब यहाँ बेखबर लगता है ।

नज़रें गर अलग है तो नजरिया भी जुदा होगा,
महादेव भी किसी किसी को पत्थर लगता है।

शायद रास्ता गली का बस मेरी ही भुला है,
चक्कर तेरी गली में उसका अक्सर लगता है

ना जाने दरमियाँ क्यों ये फासला हुआ है,
तेरी ज़हानत को भी लग गयी, नज़र लगता है ।

ज़िन्दगी में मज़ाक कुछ बढ़ से गए है,
गमो से रिश्ते में शायद देवर लगता है।

रोककर जिसे भी पूछूँगा तेरे घर का पता,
वो गुमराह ही कर देगा ये डर लगता है।

डाक बक्से में कुछ गुमनाम ख़त आ रहे है,
कौन होगा ? ये अंदाज़ा रात भर लगता है।

पहुचते ही मिले जो मुस्कान बिटिया की
ढांचा वो ईंटो का बना, अब घर लगता है।

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