इज़्हार हो ना पाया

इज़्हार हो न पाया
मोहब्बत मुकम्मल हो न पाया
धड़कता था यह दिल उनके खातिर
खो न दें उनको
यह सोच कुछ कह न पाया।
पहले पहल रूप उनका दिल को भाया
कह दें कह दें अपने दिल की बात
इसी कश्मकश में कह न पाया
इज़्हार हो न पाया
मोहब्बत मुकम्मल हो न पाया।
रास्ता तकता था हर रोज़ उनका
खोने के डर से मुलाकात पर भी
उनके कदमों से कदम
न मिला पाया
इज़्हार हो न पाया
मोहब्बत मुकम्मल हो न पाया।
– प्रदीप

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