Feb 15, 2017 · कविता
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इस बार की दिवाली कुछ ऐसे मना लेना।

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इस बार की दिवीली
कुछ ऐसे मना लेना।

प्रेम की बाहें खोल कर
बुजुर्गों को गले लगा लेना।
घायल नम आँखों में एक
आशा का दीप जला देना।

इस बार की दिवाली
कुछ ऐसे मना लेना।

जिनकी देख नहीं पाती आँखे
कुछ पैसे उनको दे आना।
जिनसे दुनिया वो देख सके
एक ऐसी दीप जला देना।

इस बार की दिवाली
कुछ ऐसे मना लेना।

खील – खिलौने, खांड – बतासे
मिठाई-कपड़े, फुलझरी-पटाखे।
अनाथों को भी दे आना
मन ही मन घुटते,तरसतेआँखों में
खुशियों का दीप जला देना।

इस बार की दिवाली
कुछ ऐसे मना लेना।

जिस घर में अंधेरा छाया हो
उस घर में उजाला कर देना।
झोपड़ी में ज्योति जीवन का
नन्हा सा प्रकाश फैला देना।
भूखे गरीब के आँगन में
एक स्नेह का दीप जला देना।

इस बार की दिवाली
कुछ ऐसे मना लेना।

अमीरी-गरीबी का फर्क मिटा
जाति – पाती का धर्म हटा
हर दिल को गले लगा लेना।
रोते-बिलखते हर चेहरे को
एक बार खुशी से हँसा देना।

इस बार की दिवाली
कुछ ऐसे मना लेना।
????—लक्ष्मी सिंह

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लक्ष्मी सिंह
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MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is... View full profile
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