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इसी में जीवन पाओगे

आज विश्व पृथ्वी दिवस पर मेरी स्वरचित कविता माँ भारती के चरणों में समर्पित

आज न जाने देश ये मेरा,
खड़ा है किस चौराहे पर।
संकट के बादल हैं छाए,
जीवन – मृत्यु दो रहे पर।।1।।

मानव ही मानव का सेवक,
मानव ही बना शिकारी है।
मानव से मानव में फैली,
कैसी भीषण बीमारी है।।2।।

जब तक साथ दिया प्रभु नें,
हमनें हिम्मत नहीं हारी है।
हार मान रही है ये दुनियाँ,
कैसा ये बिकट प्रहरी है।।3।।

इस संकट ने जीवन में,
लाया ये कैसा मोड़ है।
अपना जीवन स्वयं बचने,
लगी ये अद्भुत होड़ है।।4।।

स्वच्छ प्रकृति के दोहन का,
लाभ उठाया तुमने भरपूर।
इसी कारण होना पड़ा,
घर में रहने को मजबूत।।5।।

अभी समय है जागो मानव,
वरना तुम पछताओगे।
प्रकृति का करलो आदर,
इसी में जीवन पाओगे।।6।।

स्वरचित कविता
तरुण सिंह पवार

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तरुण सिंह पवार
तरुण सिंह पवार
सिवनी (मध्य प्रदेश)
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साहित्य समाज का दर्पण होता है इसी दर्पण में भिन्न भिन्न प्रतिबिम्ब दिखाई देते है...
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