कविता · Reading time: 1 minute

इश्क़ और इंकलाब

हम बगावत की मशाल उठाएं
या थामें महबूब का हाथ?
घुलता जा रहा था दिल हमारा
इसी कशमकश में दिन-रात!
तभी कहीं दूर आसमान से
आई एक पुरसोज़ आवाज़!
“इश्क और इंकलाब अलग नहीं
दोनों ही साध ले एक साथ!”
Shekhar Chandra Mitra

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Lyricist, Journalist, Social Activist
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