इम्तिहाँ मत लीजिये मेरी वफ़ा का

इम्तिहाँ मत लीजिये मेरी वफ़ा का
आपको कुछ डर नहीं है क्या ख़ुदा का
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ग़ज़ल
क़ाफ़िया- आ, रदीफ़- का
अरक़ान-फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
वज़्न-2122 2122 2122
बहर- बहरे रमल मुसद्दस सालिम

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इम्तिहाँ मत लीजिये मेरी वफ़ा का
आपको कुछ डर नहीं है क्या ख़ुदा का
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रब बनाता चल रहा है राह आगे
है असर ऐसा मेरी माँ की दुआ का
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ज़िंदगी रोते हुए उसने गुजारी
था नहीं हक़दार वो ऐसी सजा का
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क्या किसी के अश्क हँसकर पोछता वो
ज़ख़्म जो था ख़ुद लिये दिल पर जफ़ा का
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पा नहीं सकता है अपनी मंज़िलें वो
जो सदा चाहे मुआफिक रुख़ हवा का
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लौट कर जाना नहीं मंज़ूर मुझको
क्या करूँ आती हुई पीछे सदा का
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राकेश दुबे “गुलशन”
05/11/2016
बरेली

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