इन्तहा

इन्तहा
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बहुत कुछ दरक गया है मेरे अन्दर
देखकर,सुनकर
पल भर में बेजान होते इंसानी जिस्म
वातावरण में फैलती बारुदी गंध
कामयाब होते इन्सानी नफ़रत
फैलाने के मंसूबे
बेगुनाहों की सुनाई देती चीखें
अपनों को हमेशा के लिए खो देने का दर्द
टूटते बिखरते अनगिनत ख्व़ाब
सूनी होती मांग और कलाई
सभी अपने इन हालात पर
अपना गुनाह पूछते
आसमान को ताकती पथराई आँखें
ज़िन्दगी को अब भार समझते बुजुर्ग
एक दूसरे की आँखों में झांकते
अपना कल तलाशते जवान
इन सबसे बेखबर नन्हे बच्चे
हक़ीकत से अनजान
अपनों को ताकते हुए
शुरू होता श्रद्धांजलि देने का सिलसिला
सिलसिला थमने से पहले
शुरू होता ऐसा ही एक और सिलसिला
इन्तहा हो गई है
रोकना होगा इसे हर हालत में
जोश से होश में हम सब को मिलकर…………..
— सुधीर केवलिया

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