इधर फितरत बदलती जा रही है

इधर फितरत बदलती जा रही है
उधर उल्फत बिखरती जा रही है

इमारत ऊँची ऊँची थाम कर अब
कमर धरती की झुकती जा रही है

चढ़ा कर स्वार्थ का चश्मा नज़र पे
नमी आँखों की पुछती जा रही है

समय के साथ देखो ज़िन्दगी भी
किये बन्द आँख चलती जा रही है

कभी रिश्तों भरी होती थी दुनिया
एकाकी आज बनती जा रही है

यहाँ पर ‘अर्चना’ के नाम कितने
ये दुनिया ढोंग करती जा रही है

डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद(उ प्र)

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