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इतराती बलखाती अदाओं के रुख़ मोड़े गये

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

December 11, 2016

इतराती बलखाती अदाओं के रुख़ मोड़े गये
ले जा के तूर पर सर हवाओं के फोड़े गये

आने लगे थे ख़्वाब कुछ हाये दिल से उठकर
मानिंद गीले कपड़े के आँख से निचोड़े गये

बता कौन निभाता है खून के भी रिश्ते यहाँ
हां वो भी आख़िर टूटे जो दिल से जोड़े गये

कुछ इस तरह रहा तमाम उम्र का हिसाब मेरा
कुछ गये संजीदगी में दिल्लगी में थोड़े गये

हुआ दिल के पार कोई कोई जिगर के पार था
किस किस की जबां के तरकश से तीर छोड़े गये

मुद्दत बाद सोया है गहरी नींदों में कोई
यूँ लगता है उसके बेचे सारे घोड़े गये

जिन्हें याद ही न हुआ सबक़ मोहब्बत का यहां
वो दरबार-ए-ज़ीस्त में ‘सरु’ खाते कोड़े गये

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Author
suresh sangwan
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